गुरुवार, 10 नवंबर 2016

//साहित्य श्री-4 का परिणाम//

साहित्य श्री-3 ‘एक कदम उजाले की ओर‘ विषय पर आयोजित किया गया जिसमें 11 रचनाकार मित्र हिस्सा लिये । सभी रचनाकारों का प्रयास सराहनीय रहा । इस आयोजन के सभी प्रतिभागियों का हार्दिक आभार । प्राप्त रचनाओं में भाव, शिल्प और दिये गये विषय के साथ न्याय संगतता के आधार परनिर्णायक डॉ. प्रो. चन्द्रशेखर सिंह ने निम्नानुसार परिणाम घोषित किये हैं-

प्रथम विजेता-श्री चोवा राम वर्मा ‘बादल‘
द्वितीय विजेता-श्री दिलीप कुमार वर्मा
तृतीय विजेता- श्री जीतेन्द्र वर्मा ‘खैरझिटिया

सभी विजेता बंधुओं को ‘छत्तीसगढ़ साहित्य श्री‘ एवं छत्तीसगढ़ी साहित्य मंच‘ की ओर से कोटिश बधाई ।
सभी रचनाकारो से आपेक्षा की इसी प्रकार साहित्य सृजन में सहयोग प्रदान करते रहेंगे ।

‘छत्तीसगढ़ साहित्य श्री‘

मंगलवार, 1 नवंबर 2016

//साहित्य श्री-5 की रूपरेखा//

अवधि- 1 नवम्बर 2016 से 15 नवम्बर 2016 तक
विषय-‘‘घर के भेदी लंका ढाय‘‘
विधा-विधा रहित
मंच संचालक- श्री मनोज कुमार श्रीवास्तव (सह एडमिन)
निर्णायक-डाँ. प्रो. चंद्रशेखर सिंह

नियम-प्रतिभागी रचना केवल छत्तीसगढ़ साहित्य दर्पण में पोस्ट होनी चाहिये । प्रतियोगिता अवधि में यह रचना अन्यत्र प्रकाशित नही होना चाहिये ।
रचना के ऊपर ‘साहित्य श्री-4‘‘ हेतु रचना लिखना आवश्यक होगा ।
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‘साहित्य श्री‘ हिन्दी कविताओं का प्रतियोगिता
उद्देश्य -1. हिन्दी काव्य के विभिन्न विधाओ की जानकारी, उस विधा में रचना, एवं रचना में कसावट लाना । ‘सिखो और सीखाओ‘ के ध्येय वाक्य से एक दूसरे के सहयोग से अपने लेखन कर्म को सार्थक करना ।
2. विशेष कर छत्तीसगढ़ के नवरचकारो को भाव अभिव्यक्ति हेतु मंच उपलब्ध कराना ।
3. प्रदत्त विषय में लेखन क्षमता विकसित करना ।
प्रारूप-प्रत्येक माह दो आयोजन 1. 1 से 15 तारीख तक विषय/शिर्षक आधारित 2. 16 तारीख से 30 तारीख तक चित्र या काव्यांश आधारित ।
प्राप्त रचनाओं को वरिष्ठ हिन्दी साहित्यकारों से मूल्यांकन करा कर श्रेष्ठता तय कर श्रेष्ठ रचना को ‘साहित्यश्री‘ के मानक उपाधी से सम्मान करना ।

साहित्यश्री-4//11//ज्ञानु मानिकपुरी"दास"

'उजाले की ओर हर कदम हो'
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मुश्किल हो राहे फिरभी चलना होगा
अंधेरों में बनके दिया जलना होगा।
मत हारना तू! ऐ मुसाफिर
हर दर्द को चुपचाप सहना होगा।
दिल मेरा बरसों से प्यासा है
मिल जाये उम्मीद की बूँद आशा है।
लड़ जाऊ मैं भी अंधेरो से
'उजाले की आस' बस जरा सा है।
हवा बनकर हर राह चलना होगा
बिछड़े हुये लोगों से मिलना होगा।मत.....
जिंदगी की कितनी अजीबो रंग है
लोगों का भी अपना-अपना ढंग है।
मिलना बिछड़ना यहाँ रीत है'प्यारे'
हर पल जिंदगी एक जंग है।
यहां हर मौसम में ढलना होगा
उसी का दुनिया अपना होगा।मत......
जिंदगी में खुशियां हो चाहे गम हो
कितनी भी। घोर चाहे तम हो।
कुछ हासिल करना चाहते हो गर"ज्ञानु"
'उजाले की ओर हर कदम हो'
जिंदगी की हर पहलु को समझना होगा
जिंदगी जीने के लिए पल पल मरना होगा।मत..
ज्ञानु मानिकपुरी"दास"
चंदेनी कवर्धा

साहित्यश्री-4//10//दिलीप पटेल

" एक कदम उजाले की ओर "
**************************************नित नविन शालीन पथ पर
चलना है हम सबको मिलकर
अब आ गई है क्रांती की दौर ....
आओ मिलकर साथ बढायें, एक कदम उजाले की ओर !!
राहों में मुश्किल तुफाने को
या सागर की ऊफानो को
लांघनी हर शरहदो को, काले बादल घटा घनघाेर....
आओ मिलकर साथ बढायें एक कदम उजाले की ओर !!
छुट न जावें कोई अपना
टूट न जावें कोई सपना
दिशाओं में नही भटकेंगे , थाम कर एकता की डोर.....
आओ मिलकर साथ बढायें, एक कदम उजाले की ओर !!
दीन दूखी या कोई बेसहारा
बनेंगे हम सबका सहारा
कोई भी न भूखा सोने पाये , खायेंगे रोटी बांट कर कौंर....
आओ मिलकर साथ बढायें, एक कदम उजाले की ओर !!
मिटेगी मन की अंधियारी
महकेगी फूलों की क्यारी
अंत होती है निशा की , पा करके रवि का भोर....
आओ मिलकर साथ बढायें, एक कदम उजाले की ओर !!
दृढता की संकल्प होगी
अब न कोई विकल्प होगी
मन में है विस्वाश हमारा , हम जा रहे है सफलता की ओर.....
आओ मिलकर साथ बढायें, एक कदम उजाले की ओर !!
दिलीप पटेल बहतरा, बिलासपुर
मो.नं.-8120879287

सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

साहित्यश्री-4//9//ज्ञानु मानिकपुरी"दास"

'उजाले की ओर हर कदम हो'
-----------------------------------
मुश्किल हो राहे फिरभी चलना होगा
अंधेरों में बनके दिया जलना होगा।
मत हारना तू! ऐ मुसाफिर
हर दर्द को चुपचाप सहना होगा।
दिल मेरा बरसों से प्यासा है
मिल जाये उम्मीद की बूँद आशा है।
लड़ जाऊ मैं भी अंधेरो से
'उजाले की आस' बस जरा सा है।
हवा बनकर हर राह चलना होगा
बिछड़े हुये लोगों से मिलना होगा।मत.....
जिंदगी की कितनी अजीबो रंग है
लोगों का भी अपना-अपना ढंग है।
मिलना बिछड़ना यहाँ रीत है'प्यारे'
हर पल जिंदगी एक जंग है।
यहां हर मौसम में ढलना होगा
उसी का दुनिया अपना होगा।मत......
जिंदगी में खुशियां हो चाहे गम हो
कितनी भी। घोर चाहे तम हो।
कुछ हासिल करना चाहते हो गर"ज्ञानु"
'उजाले की ओर हर कदम हो'
जिंदगी की हर पहलु को समझना होगा
जिंदगी जीने के लिए पल पल मरना होगा।मत..
ज्ञानु मानिकपुरी"दास"
चंदेनी कवर्धा

साहित्यश्री-4//8//जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

💥एक कदम उजाले की ओर💥
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न देख पाँव के,
छाले की ओर।
बढ़ चल एक कदम,
उजाले की ओर।
चलकर ही हासिल होगी,
खुशियाँ जीवन में,
फिर क्यों झाँकता है,
किस्मत के आले की ओर।
उजाला अच्छाई का,
दुर्गम पथ है।
तम बुराई का,
सुगम रथ है।
एक जीवन खुशियों से भरती है।
एक खुशियों में ही छेद करती है।
फिर क्यों जा रहे हो,
तम के जाले की ओर।
बढ़ चल एक कदम,
उजाले की ओर।
तिमिर पथ भी जगमग होगी।
जब उजाले में पग होगी।
राह में आएगीं रुकावटें बहुत,
चोर-उचक्का और ठग होगी।
लगन की चाबी को घुमा,
खुशियाँ रूपी ताले की ओर।
बढ़ चल एक कदम,
उजाले की ओर।
कार्तिक अमावस की,दिवाली देख लो।
चंद दीयों में रौशन,रात काली देख लो।
ऐसी बरसी माँ लक्ष्मी ,की कृपा,
भर गये हाथ , खाली देख लो।
प्रेम का दीपक दिल में जला,
न भाग बरछी-भाले की ओर।
बढ़ चल एक कदम,
उजाले की ओर।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बालको(कोरबा)
9981441795

साहित्यश्री-4//7//सुनिल शर्मा"नील"

"एक कदम उजाले की ओर"
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"तम" को "श्रम" से हराकर,तिरंगा
लहर-लहर लहराते है
"उद्यम" के महामंत्र से,भारत को
विश्वगुरु बनाते है
असीमित ऊर्जा है हममें,आओ
पहचाने इसे
उजाले की ओर चलो एक कदम
बढ़ाते है
कहीं बर्बाद होता भोजन,कहीं लोग
भूखे सो जाते है
ऐसे असमानता के रहते भला,किस
विकास पर इतराते है
इस दीवाली शांत कर भूखों की
क्षुधा को
प्रकाश में दीए के चलो "भूख"
को जलाते है
"बेटियाँ" आज भी भीड़ में निकलने
से घबराती है
कितनी बेटियों की अस्मत हर रोज
लूटी जाती है
करके दुशासन का वध,हराकर कौरव
सेना को
समाज में नारी को निर्भयतापूर्वक
जीना सिखातें है
स्वार्थ में अंधे होकर हमने स्वयं पर ही
वार किया
नष्ट किया जल,जंगल और जमीन को
जीवों का संहार किया
इससे पहले पूर्णतः नष्ट हो जाए
प्यारी प्रकृति
चलो नारा "सहअस्तित्व" का जन-जन
को सिखातें है
किस बात की डिग्रियाँ जब तक देश में
अशिक्षा का नाम है
अंधविश्वास और कुरीतियों के कारण
राष्ट्र होता बदनाम है
हर कोने तक प्रकाशित हो शिक्षा का
दिव्य प्रकाश
मिलकर परस्पर चलो ऐसा "दिनकर"
उगाते है
हमारे सुकून की खातिर जो सीमा पर
प्राण गंवातें है
देश के कुछ आस्तीन फिर भी जिनका
हौंसला गिराते है
बनकर संबल ऐसे माँ भारती के
सपूतों का
आतंकवादियों को चलो उनकी
औकात बताते है
स्वच्छता का भारत के हर घर में
संस्कार हो
स्वस्थ रहे समाज मेरा न कोई इसमें
विकार हो
भाव ये प्रतिबद्ध होकर दौड़े हर
हृदय में
चलो मिलकर एक नया "स्वच्छ
भारत बनाते है|
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सुनिल शर्मा"नील"
थान खम्हरिया,बेमेतरा(छ. ग.)
7828927284
28/10/2016
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