सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

साहित्यश्री-4//8//जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

💥एक कदम उजाले की ओर💥
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न देख पाँव के,
छाले की ओर।
बढ़ चल एक कदम,
उजाले की ओर।
चलकर ही हासिल होगी,
खुशियाँ जीवन में,
फिर क्यों झाँकता है,
किस्मत के आले की ओर।
उजाला अच्छाई का,
दुर्गम पथ है।
तम बुराई का,
सुगम रथ है।
एक जीवन खुशियों से भरती है।
एक खुशियों में ही छेद करती है।
फिर क्यों जा रहे हो,
तम के जाले की ओर।
बढ़ चल एक कदम,
उजाले की ओर।
तिमिर पथ भी जगमग होगी।
जब उजाले में पग होगी।
राह में आएगीं रुकावटें बहुत,
चोर-उचक्का और ठग होगी।
लगन की चाबी को घुमा,
खुशियाँ रूपी ताले की ओर।
बढ़ चल एक कदम,
उजाले की ओर।
कार्तिक अमावस की,दिवाली देख लो।
चंद दीयों में रौशन,रात काली देख लो।
ऐसी बरसी माँ लक्ष्मी ,की कृपा,
भर गये हाथ , खाली देख लो।
प्रेम का दीपक दिल में जला,
न भाग बरछी-भाले की ओर।
बढ़ चल एक कदम,
उजाले की ओर।
जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बालको(कोरबा)
9981441795

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