शनिवार, 1 अक्टूबर 2016

साहित्यश्री-2//12//गोपाल चन्द्र मुखर्जी


मुक्तछन्द में निर्झरिणी
साबलील प्रबाहिता,
कुलु कुलु रवे नृत्यरता
सागर मिलने का आशा।
उद्यमी मानव सर्वग्रासा
कब्जा किया है मेरा किनरा,
वह तो उसका नही है
कौन उसे समझायेगा?
चरते रहे बछरे
खेलते रहे बच्चे,
बुढे बच्चो का निस्तारा
अभी बने है ताकतवर का कब्जा।
भूमि,है तो सरकारी -
लेकिन उसमे हुआ क्या!
हम करते है नेतागिरी
तुम जो दिए हो मुझे सत्ता।
इसे नही कहते है बेजाकब्जा
यह तो मेरा ताकत है बच्चा!
अतिक्रमणकारी हम नही -
हम तो सत्ता धारी,
वह, है अतिक्रमणकारी
जो है गरीव झोपरीधारी!
छोटासा किसान,
शासन को देता है लगान!
जमीन का वह टुकरा
पसन्द है मेरा,
अदा करुङा दाम
दिए नही, यह है मेरा अभिमान
कर लिया हूँ कुछेक कब्जा -
नाहि किया काम कच्चा,
मातहत का पकडे चरण
अब कौन कहेगा, इसे अतिक्रमण?
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( गोपाल चन्द्र मुखर्जी )
४४,सुरजमूखी ,
राजकिशोर नगर
बिलासपुर (छ.ग.)
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