सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

साहित्यश्री-4//5//शुभम वैष्णव

क्योकि नहीं है जीवन में सिर्फ अँधेरा,
एक कदम और उजाले की ओर बढ़ा।
माना दुनिया में बहुत है तेरे दुश्मन।
लेकिन कुछ करने का आज बना ले मन।
मिलता किसे नहीं दुनिया में दर्द भला,
एक कदम और उजाले की ओर बढ़ा।
औरों की भलाई लोग अगर करते हैं।
वो अमर होते है जब कभी भी मरते हैं।
अपना हाँथ बढ़ाने से न ऐसे घबरा,
एक कदम और उजाले की ओर बढ़ा।
तेरे साथ खड़ा ये सारा जमाना है।
तुमको स्वर्ग धरा को फिर से बनाना है
जितनी है हिम्मत तुझमे वो आज लगा,
एक कदम और उजाले की ओर बढ़ा।
अभिमन्यु की वीरता तू करके याद निकल।
तेरा क्या है ये समझने के बाद निकल।
तेरे खातिर सभी करेंगे आज दुआ,
एक कदम और उजाले की ओर बढ़ा।
-शुभम वैष्णव

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें