रविवार, 16 अक्टूबर 2016

साहित्यश्री-3//7//गोपाल चन्द्र मुखर्जी

" जय माता दी "
जय माता दी जयकारा 
संतान तेरा करेगा क्या!
माँ,आप जाकर बैठी हो 
दुर्गम पर्वत पर, 
अन्धेरा गुफा में 
घनघोर गभीर जंगल में। 
चाहते है मन, तेरी दर्शण, 
खुशीभरे दिल, मन चंचल। 
भुखे - प्यासा पैर लड्खराई 
तेरी नाम ही संबल हे महामाई। 
दिए चले तेरा जयकारा
जय माता दी, जय हो माता, 
दर्शण मिलें चरण तुम्हारी 
सार्थक हो जनम हमारी॥ 
माता जी,आप ही महाचण्डी,
महालक्ष्मी,महासरस्वती। 
आप ही आदिशक्ति महामाया वैष्णवी
दशमहाविद्या करालबदना महाकाली। 
अरिहन्ती रक्षाकर्ती शिवप्रिया भैरवी 
त्रिनेत्री अस्टभूजी सन्तानस्नेही गौरी॥ 
यौवनवती तेजोमयी प्रचण्ड बलशालीनी
रणप्रिया अभया दुर्गे, दुर्गति नाशिनी, 
सर्वपाप विनाशिनी धर्म मोक्ष दयिनी। 
मनाते है संतान नवरात्री 
जागरन, जयकारा जय माता दी॥ 
*** 
(गोपाल चन्द्र मुखर्जी)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें