सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

साहित्यश्री-4//3//दिलीप कुमार वर्मा

""एक कदम उजाले की ओर""
चलो घर-घर दीप जलाएं,
कोने-कोने को चमकाएं। 
प्रेम भरा अमृत बरसा कर
घर आँगन सब का महकाएं।
रहे न कोई कमजोर
एक कदम उजाले की ओर। ।1।
चलो सदा नेकी कर जाएं
भटके को हम राह दिखाएँ ।
मानवता का बन मिशाल हम
हाँथ पकड़ मंजिल पहुंचाए।
भाई चारे का दौर
एक कदम उजाले की ओर। ।2।
झोपड़ पट्टी कहीं दिखे न
दुखिया हमसे कहीं छिपे न
हर पंगु का पैर बने हम
पग हमारा कहीं रुके न।
तिमिर न हो घनघोर
एक कदम उजाले की ओर। ।3।
चारो तरफ खुशियाँ बगराएं
बच्चों में हम प्यार लुटाएं
अपनों का एहसास दिलाकर
दया मया सब में बरसाएं।
खुशियों का हो शोर
एक कदम उजाले की ओर। ।4।
हर एक घर में चंदा चमके
घर-घर में अब सूरज दमके
बिछे चाँदनी आँगन-आँगन
सुबह शाम घर खुशियाँ खनके
सुंदर सा हो भोर
एक कदम उजाले की ओर। ।5।
कहीं न कोई भिखारी होगा
चलने को न कटारी होगा
हर कोई अब सांथ रहेंगे ।
कहीं न अब अंधियारी होगा
गूंजे नभ में शोर
एक कदम उजाले की ओर। ।6।
जहां कोई न भूखा होगा
देश कभी न सुखा होगा
मेहनत की जो राह पकड़ लें
बात कभी न झूठा होगा।
उजियारा हो अंतिम छोर
एक कदम उजाले की ओर। ।7।
चलो स्वच्छता अलख जगाएं
जन-जन को हम कह समझाएं
शौचालय की राह पकड़ कर
सुंदर भारत देश बनाएं।
रखें स्वच्छ सब ओर
एक कदम उजाले की ओर। ।8।
दिलीप कहे ये बात पुरानी
घटी है घटना, नहीं कहानी
एक अकेला तोड़ पहाड़ी
करी सुगम ओ राह दुखानी ।
साहस था पुर जोर
एक कदम उजाले की ओर। ।9।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाजार
9926170342

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