मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

साहित्यश्री-3//2//ज्ञानु मानिकपुरी"दास"

"जयमातादी"
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थामा है हाथ जबसे, बिगड़ी बनते साज।
जो भी आया शरण में,होते पूरण काज।
होते पूरण काज,राज है महिमा माँ का।
चरणों में होते माथ, होय कभी बाल न बॉका।
जय माता दी जपू,सदा ही अपने मुखसे।
गम नही नही फ़िकर,थामा है हाथ जबसे।
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ज्ञानु मानिकपुरी"दास"
चंदेनी कवर्धा
9993240143

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