मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

साहित्यश्री-6//8//दिलीप पटेल बहतरा

नोट की चोट
"""""""""""""/""""""/""""""/""""""""""""""""""
दो नम्बरीयों को लाले पड गये सी गई सबकी होंट
दुम दबाकर बैठ गये है , जबसे बंद हो गई है नोट
बहुत हो गई थी भ्रष्टाचार
खतम होने को थी सदाचार
खूब दौडाया रेगीस्तां में ऊंटें,अब फस चुकी नैया मझधार,
कैसे पार लगेगी नैया जब मन मे भरी हो खोंट ही खोंट ......
दूम दबाकर बैठ गये है जब से बंद हो गई है नोट !
ईन्ही के दम पर ताकतें बढाई
सत्तासीन हो कुर्सी हथीयाई
सेज़ बहारो की पर सोते थे,
देखलो आज नही मिल रही है चार पाई
नींद भी कैसे आये इनको जब चादर हो गई हो छोट........
दूम दबाकर बैठ गये है जबसे बंद हो गई है नोट !
गरीबों की क्या जाने वाला
रुखा सूखा खाने वाला
जिसने गडा कर रखी हुई है,
छट पटा रहा है काला धन वाला
दात देता हू मै सरकार को कि हृदय मे कालाधनीयों की किये गम्भीर चोंट.......
दूम दबाकर बैठ गये है जबसे बंद हो गई है नोट !
सब कुछ दांव पर लग जायेगी
आगे जब जब चुनाव आयेगी
निस्वार्थ,बिना प्रलोभन के जनता जब किसी को चुन पायेगी,
लोक तंत्र मजबूत होगी जब सार्थक होगी हमारी वोट......
दूम दबाकर बैठ गये है जब से बंद हो गई है नोट !
दिलीप पटेल बहतरा, बिलासपुर
मो नं. 8120879287

साहित्यश्री-6//7//सुनिल शर्मा"नील"

नोटबंदी अभियान
********************************
खेलते थे आजतक जो देश के 
सम्मान से
हाथ कीचड़ से सने सजते धवल
परिधान से
देख तड़पन आज उनकी अवनि
को राहत मिली
मुस्कुराई ""भारती""मोदी के इस
अभियान से |
********************************
सुनिल शर्मा"नील"
थानखम्हरिया(छ. ग.)
7828927284

साहित्यश्री-6//6//आचार्य तोषण धनगांव

चुनकर मुखिया आ जाते, लोकतंत्र में वोट से।
देखो पड़ा हुआ आहत, जो नोट की चोट से।।
छिपा रखा जो कलाधन, आज वही बोल रहा।
जो कभी थे छुपे रूस्तम, राज यहाँ खोल रहा।।
देखो छिड़ गया अभियान, ना रूकेगा अब कभी।
एक हो तब विकास सबका, होगा खुशहाल सभी।।
कमीशन से रुपया गढ़े, जेब भरे जो लूट के।
हालत देखो अब उनकी, गिर गये पत्ते सूख के।।
नोट से ही काम बनता, बि_गाड़ता काम यही।
कहता "तोषण" घुंस न लेना, मा_नवता होगा वही।।
© ®
आचार्य तोषण धनगांव

साहित्यश्री-6//5//नवीन कुमार तिवारी

विधा-विधा रहित,,
नोट की चोट , के लिए एक प्रयास 
शुभ प्रभात
लगे न किसी को नोट की चोट ,
देखो केसे निकल रहा ,
या गरीबो की इज्जत से खेल रहा,
कतार में फटी लंगोटी धारी दिख रहा
बस कुछ अदद नोट लिए ,
लोगो की तीखी नजरो से छिपाए हुए
इधर उधर कसमसाये हुए
अधमरा सा सताए हुए
नोट बंदी के खेल में ,
कुछ तो सुनहरा चल रहा ,
अरे जो दस का मारा पेट्रोल,,
उस पर बाजी लगा दिए ,,
जो दस लुटे उस पर भरोसा कर लिए ,,
मतलब ,,,चोर चोर मोसेरे जी ,
सदन में देखो कुत्ते बिल्ली की लढाई जी ,
ये करवा रहे विवाह जी ,
मात्र ढाई की दे रहे सौगात जी ,
क्या ढाई में जलता अगर बत्ती जी
दहेज़ भूलो, खिलावोगे क्या घास फुंस जी ,
जिनके किये वारे न्यारे ,
क्या वे लगे कतार में जी
नाहक अन्नदाता को भी किये परेशांन ही जी
निकालना चाहा आपने
निकलना चाहा आपने
वो कालाधन ही जी
पर देखो निकल रहा ,
सिर्फ गरीबोका , मध्यमो का असुरक्षित धन जी ,
समय असमय के लिए,
जो किया था संचय जी
फटी लंगोटी में भी छिपाया था,
क्या वो काला धन जी,
सोचा था ,जिनसे छिपाया था
क्या कहेंगे वे चार लोग जी
अरे अरे इसके पास बस इतना ही जी ,

नवीन कुमार तिवारी ,, २३.११.२०१६
एल आई जी १४ /२ नेहरू नगर दुर्ग
४९००२० .....मो न . ९४७९२२७२१३

साहित्यश्री-6//4// गुमान प्रसाद साहू

विषय - नोट के चोट
विधा- हरिगितीका छंद में प्रयास----------------------------------
पाँच सौ हजार पर रोक जब,
लगाया सरकार है।
नोट के चोट सभी खा रहे,
थम गया बाजार है।।
नोट बदली करने को सभी,
लोग खड़े कतार में।
रोज चक्कर लोग लगा रहे,
बैंकों के द्वार में।। 1।।
सरकार ने नोटबंदी का,
दिया जब फरमान है।
भ्रष्टाचारी जमाखोर का,
लुट गया अरमान है।।
नोट के चोट ने उनपे भी,
किया डर का वार है।
पाँच सौ,हजार पर रोक जब,
लगाया सरकार है।।2।।
भरे बैठे थे जो घरों में,
नोटो के अम्बार है।
कर रहे थे कालेधनों के,
लोग जो व्यापार है।।
आज नोट को वो बहा रहे,
जा नदी के धार है।
पाँच सौ,हजार पर रोक जब,
लगाया सरकार है।।3।।
छूपा बैठे थे कालाधन,
लोग जो इस देश के।
जमा कर रखें थे खातो में,
बैंकों में विदेश के।।
मच रहे अब उनके दिलों में,
आज हाहाकार है।
पाँच सौ ,हजार पर रोक जब,
लगाया सरकार है।।4।।
रचना :- गुमान प्रसाद साहू
ग्राम-समोदा(महानदी)
मो. :- 9977313968
जिला-रायपुर छ.ग.

साहित्यश्री-6//3//सुखदेव सिंह अहिलेश्वर

विषय:-- //नोट का चोट//
कालाधन 
कराह रहा,
पड़ा नोट का चोट।
जनता का विश्वास जीत जो,उस से छल करते है।
जनता के ही धन मन पर फिर,भ्रष्ट नियत रखते है।
आज
उजागर हो रहा,
भ्रष्ट नियत का खोट।
जमाखोर हैं असमंजस मे,हांथ पांव फूला है।
आंख रगड़ रहा भ्रष्टाचार,शायद आंख खुला है।
आज
जुगत मे जुट गये,
सफेद करने नोट।
जाली नोट जाल फैला था,थम जायेगा धंदा।
आतंकवाद भुखा मरेगा,बंद पड़ेगा चंदा।
नोटबेन
से हो गया,
कूड़ा जाली नोट।
रचना:--सुखदेव सिंह अहिलेश्वर"अंजोर"
गोरखपुर,कवर्धा

साहित्यश्री-6//2//जीतेन्द्र वर्मा

नोट का चोट
------------------------
खजाने का नोट।
दे गया चोट।
पल में धूल गए,
कई स्वप्न;कई सोच।
नोट का चोट,
उसको लगा गहरा।
बड़े - बड़े नोटों का,
जमाखोर जो ठहरा।
जो खेल रहे थे,
नकली नोटों से ।
घायल है आज,
नोटबंदी के चोटों से।
किसी की कमर टूटी,
किसी को आया मोच।
खजाने का नोट।
दे गया चोट।
पल में धूल गए,
कई स्वप्न; कई सोच।
जिसका लेनदेन खरा था,
वो खुश है।
छुपाकर तिजोरी भरा था,
उसे दुख है।
क्या चोट उसे,
जिसकी जिंदगी ही चोट है।
हाथो में निवाला हो बहुत है,
उनके जेबों में कहाँ नोट है।
पर लग गए ठिकाने,
बड़े-बड़ो का होश।
खजाने का नोट।
दे गया चोट।
पल में धूल गए,
कई स्वप्न;कई सोच।
निजात पाएंगे,जमाखोरी,टैक्सचोरी,
भ्रस्टाचारी और आतंकवाद से।
दिखेगा बैंको में , लेनदेन आज से।
पता चलेगा ;कि कौन?
कितना रकम रखा है।
नोट बंदी कर सरकार ने,
मुद्रा को कसा है।
साथ देना उचित है,
अनुचित है;देना दोष।
खजाने का नोट।
दे गया चोट।
पल में धूल गए,
कई स्वप्न; कई सोच।
जीतेन्द्र वर्मा "खैरझिटिया"
बालको(कोरबा)
9981441795
पसंद करेंऔर प्रतिक्रियाएँ दिखाएँ