शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

साहित्यश्री-2//10//हेमलाल साहू

@बेजा कब्जा @
करै बेजा सभी कब्जा, आज स्वार्थी लोग।
सब दिये है काँट जंगल, फ़ैलते अब रोग।।
खूब पर्यावरण पर हम, किये अत्याचार।
आज देखो सभी कितने, हो गये लाचार।।
शुद्ध पानी खोजते है, नही मिलता आज।
साँस लेना हुआ दुर्भर, मर रहै वनराज।।
भूमि अपनी आज देखोे, बनी रेगिस्तान।
मंडराया काल देखो, बचे न अब जान।।
छोड़ बेजा सभी कब्जा, प्रकृति को मत छेड़।
रहे उज्ज्वल कल हमारा, तुम लगाओ पेड़।
सोच बदलो सभी अपनी, करे विनती हेम।
रखों रिश्ता अब प्रकृति से, करो उनसे प्रेम।
-हेमलाल साहू
ग्राम गिधवा, पोस्ट नगधा
तहसील नवागढ़, जिला बेमेतरा
(छत्तीसगढ़) मो. 9977831273

साहित्यश्री-2,//9//सुखदेव सिंह अहिलेश्वर

कुंडली छंद--
लालच सुरसा की बहन,लालच का सिर फोड़।
जीवन मूल्य कर सुरक्षित,बेजा कब्जा छोड़।।
बेजा कब्जा छोड़,करने जन जीवन भला।
हिसगा रूंधानी तोड़,नफरत की फसले जला।।
सुम्मत बिरवा लगा,समरसता मे चल चला।
बबूल के पेड़ मे,फल आम है कहां फला।।
रचना:--सुखदेव सिंह अहिलेश्वर"अंजोर"
गोरखपुर,कवर्धा
9685216602

साहित्यश्री-2//8//जगदीश "हीरा" साहू

धरती माँ अपनी, व्यथा सुना रही है ।
दिनों दिन बेजाकब्जा, बढ़ती जा रही है।।
गायें भटक रही, भूख मर रही है,
चारागाह के अभाव में ।
मनुष्यों की ग्रास बन गई भूमि,
आतताइयों के स्वभाव में।।
जिस राह से गुजर जाती थी गाड़िया,
आज हो गई इतनी सकरी।
गाड़ियों की जाना तो दूर की बात,
अब अटक जाये वहाँ बकरी।।
दुनिया में ये कैसी, विकास आ रही है।
दिनों दिन बेजाकब्जा, बढ़ती जा रही है।।
सड़कों पर गाय, भैंस,
बकरी, कब्जा जमा रहे हैं।
ऐसे चलते और चलाये जाते हैं,
जैसे रोड टैक्स पटा रहे हैं।।
स्कूल की छुट्टी के बाद स्कूल में,
बेजाकब्जा है जुआ और नशेड़ियों का।
तनिक भी दर नहीँ मन में,
सजा और बेड़ियों का।।
अब सब कुछ हथियाने की, बू आ रही है।
दिनों दिन बेजाकब्जा, बढ़ती जा रही है।।
महिला सरपंच के अधिकारों का,
बेजाकब्जा कर रहे हैं सरपंच पति।
नशे की लत में पड़े गुरूजी की,
पासबुक भट्ठी में है, परिवार की है दुर्गति।।
हमारी बहनों और बेटियों पर,
नजर गड़ाये हैं दुर्बुद्धि दुर्मति।।
बेजाकब्जा की अत्याचार, सर चढ़ती जा रही है।
दिनों दिन बेजा कब्जा, बढ़ती जा रही है।।
औरों को छोडो हमारा पूरा तन है,
बेजाकब्जा के वश में।
माया की फैलाई जाल,
शब्द, स्पर्श, गंध, रूप रस में।।
आओ मित्रों हम सबसे पहले,
स्वयं की बेजाकब्जा दूर करें।
मानव जीवन है अनमोल,
जग में मशहूर करें।।
मेरी कविता आप, सबको जगा रही है।
दिनों दिन बेजाकब्जा, बढ़ती जा रही है।।
जगदीश "हीरा" साहू (व्याख्याता पं.)
कड़ार (भाटापारा)२७९१६
9009128538

साहित्यश्री-2//7//*कन्हैया साहू "अमित"*

गाँव,गली और नगर, शहर,
अतिक्रमण का बढता कहर ।
चौंक चौपाल गलियाँ ये संकरे,
निजस्वार्थ में हुए अंधें बहरें।
उद्यान,मैदान ये स्कुल,गौठान,
ना छोङा चारागाह ना श्मशान।
धरती को मानें स्वयं की पूंजी,
अतिक्रमण इन्हें विकल्प सूझी।
जमीन सरकारी हो या आबादी,
हो गई उसी की जो झंङा गङा दी।
"पावर", पैसा, पहुँच, पकङ से,
मनमर्जी जो जमीन जकङ लें।
कौन बोलेगा,कौन अब सुनेगा,
सत्ता के आगे सभी यहाँ झुकेगा।
जमीन मिट्टी नहीं खरा सोना है,
मौका हाथों से स्वर्णिम क्यों खोना है?
बिजली,पानी झटपट पा जाऐं,
बेजा कब्जा जो ज्यादा जोर जमाऐं।
मौन है सत्ता,सरकारें छलती,
अतिक्रमण हटाओ ही कहती।
दृढ ईच्छा शासन नहीं दिखाती,
निरिह गरीब को ही ये सताती ।
शासक ही ये कुटील फरेबी है,
अतिक्रमण इनकी धनदेवी है।
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*कन्हैया साहू "अमित"*
*शिक्षक* हथनीपारा~भाटापारा
जिला~बलौदाबाजार (छ.ग.)
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गुरुवार, 29 सितंबर 2016

साहित्यश्री-2//6//आशा देशमुख

विषय अतिक्रमण (बेजकब्ज़ा)
आज प्रकृति के हर तत्वों पर मानव अतिक्रमण कर रहा है जिससे कई तरह की विपदायें धरती झेल रही है ,इन्ही भावो को इंगित करता मेरा ये गीत |
अतिक्रमण
थक गए अहिराज अब तो त्रस्त महि के भार से
हेतु क्या है युग समर की
नीति को समझें जरा,
मूक क्रंदन से निकलती
आह को सुन लें ज़रा ,
ज़लज़ला हँसता सृजन के दीनता व्यवहार से
थक गए अहिराज अब तो त्रस्त महि के भार से|
कण्ठ सूखे निर्झरी के
मेरु खंडित हो रहे,
पाखियों के नीड़ उजड़े
विपिन के दुख क्या कहे,
मूल सारे गुम हुए अब मानवी अतिचार से
थक गए अहिराज अब तो त्रस्त महि के भार से |
अनगिनत हैं जख्म भू पर
वैद्य शल्य न कर सके ,
हम लगाएं वृक्ष मरहम
घाव को कुछ भर सकें ,
शेष रब सर्जन करेंगे युग कल्प उपचार से
थक गए अहिराज अब तो त्रस्त महि के भार से |
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आशा देशमुख
एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा

साहित्यश्री-2//5//चोवा राम "बादल"

विषय----- बेजा कब्जा
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बेजा कब्जा हो चुका, बचे न अब मैदान ।
गांव की नार शौच को,कित जावें श्रीमान ।
कित जावें श्रीमान ,इक कमरे का घरौंदा ।
शौचालय की बात , बड़े घाटे का सौदा ।
कह " बादल" बौराय ,लईकन खेलै छज्जा ।
पट्टा दे सरकार , करावत बेजा कब्ज़ा ।
(चोवा राम "बादल")

साहित्यश्री-2//4//गुमान प्रसाद साहू

विषय - बेजाकब्जा(अतिक्रमण)
गांव शहर सभी जगह में, बेजाकब्जा का डेरा है।
अपने स्वार्थ के चलते लोग, 
मंदिरों को भी घेरा है।
नदी नालो की जमीने, जानवरों के चारागाह की।
काट रहे हैं जंगल को भी, बिना किसी परवाह की।
सभी मे कब्जा किये बैठे हैं लोग, कहते हैं कि ये मेरा है।
वर्तमान में बची नहीं है जमीने, बस फाइलों में ही नक्शा है।
जगह हथियाने वालो ने तो, शमशान को भी नहीं बक्शा है।
अतिक्रमण के भेंट चढ़ रहा, आज पूरा देश मेरा है।
अतिक्रमण के मार सभी जगह, शहरीकरण का हवाला है।
सभी जगहो पर हो रहा बस, पैसे वालो का बोलबाला है।
बेजाकब्जा के जमीनों पर, सब नाम अपना उकेरा हैं।
गांव शहर सभी जगहो पर, बेजाकब्जा का डेरा है।
रचना :- गुमान प्रसाद साहू
ग्राम:-समोदा (महानदी)
मोबा.:- 9977313968
जिला:-रायपुर छग