धरती माँ अपनी, व्यथा सुना रही है ।
दिनों दिन बेजाकब्जा, बढ़ती जा रही है।।
दिनों दिन बेजाकब्जा, बढ़ती जा रही है।।
गायें भटक रही, भूख मर रही है,
चारागाह के अभाव में ।
मनुष्यों की ग्रास बन गई भूमि,
आतताइयों के स्वभाव में।।
जिस राह से गुजर जाती थी गाड़िया,
आज हो गई इतनी सकरी।
गाड़ियों की जाना तो दूर की बात,
अब अटक जाये वहाँ बकरी।।
चारागाह के अभाव में ।
मनुष्यों की ग्रास बन गई भूमि,
आतताइयों के स्वभाव में।।
जिस राह से गुजर जाती थी गाड़िया,
आज हो गई इतनी सकरी।
गाड़ियों की जाना तो दूर की बात,
अब अटक जाये वहाँ बकरी।।
दुनिया में ये कैसी, विकास आ रही है।
दिनों दिन बेजाकब्जा, बढ़ती जा रही है।।
दिनों दिन बेजाकब्जा, बढ़ती जा रही है।।
सड़कों पर गाय, भैंस,
बकरी, कब्जा जमा रहे हैं।
ऐसे चलते और चलाये जाते हैं,
जैसे रोड टैक्स पटा रहे हैं।।
स्कूल की छुट्टी के बाद स्कूल में,
बेजाकब्जा है जुआ और नशेड़ियों का।
तनिक भी दर नहीँ मन में,
सजा और बेड़ियों का।।
बकरी, कब्जा जमा रहे हैं।
ऐसे चलते और चलाये जाते हैं,
जैसे रोड टैक्स पटा रहे हैं।।
स्कूल की छुट्टी के बाद स्कूल में,
बेजाकब्जा है जुआ और नशेड़ियों का।
तनिक भी दर नहीँ मन में,
सजा और बेड़ियों का।।
अब सब कुछ हथियाने की, बू आ रही है।
दिनों दिन बेजाकब्जा, बढ़ती जा रही है।।
दिनों दिन बेजाकब्जा, बढ़ती जा रही है।।
महिला सरपंच के अधिकारों का,
बेजाकब्जा कर रहे हैं सरपंच पति।
नशे की लत में पड़े गुरूजी की,
पासबुक भट्ठी में है, परिवार की है दुर्गति।।
हमारी बहनों और बेटियों पर,
नजर गड़ाये हैं दुर्बुद्धि दुर्मति।।
बेजाकब्जा कर रहे हैं सरपंच पति।
नशे की लत में पड़े गुरूजी की,
पासबुक भट्ठी में है, परिवार की है दुर्गति।।
हमारी बहनों और बेटियों पर,
नजर गड़ाये हैं दुर्बुद्धि दुर्मति।।
बेजाकब्जा की अत्याचार, सर चढ़ती जा रही है।
दिनों दिन बेजा कब्जा, बढ़ती जा रही है।।
दिनों दिन बेजा कब्जा, बढ़ती जा रही है।।
औरों को छोडो हमारा पूरा तन है,
बेजाकब्जा के वश में।
माया की फैलाई जाल,
शब्द, स्पर्श, गंध, रूप रस में।।
आओ मित्रों हम सबसे पहले,
स्वयं की बेजाकब्जा दूर करें।
मानव जीवन है अनमोल,
जग में मशहूर करें।।
बेजाकब्जा के वश में।
माया की फैलाई जाल,
शब्द, स्पर्श, गंध, रूप रस में।।
आओ मित्रों हम सबसे पहले,
स्वयं की बेजाकब्जा दूर करें।
मानव जीवन है अनमोल,
जग में मशहूर करें।।
मेरी कविता आप, सबको जगा रही है।
दिनों दिन बेजाकब्जा, बढ़ती जा रही है।।
दिनों दिन बेजाकब्जा, बढ़ती जा रही है।।
जगदीश "हीरा" साहू (व्याख्याता पं.)
कड़ार (भाटापारा)२७९१६
9009128538
कड़ार (भाटापारा)२७९१६
9009128538
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