गुरुवार, 29 सितंबर 2016

साहित्यश्री-2//2//जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

अतिक्रमण
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अतिक्रमण जंगल में देखो,
अतिक्रमण नदी-नालों में।
अतिक्रमण राहों में देखो।
अतिक्रमण खेत मैदानों में।
इंच - इंच में इंसान,
ईमारत बना रहे है।
खाली जमीं को कुतर-कुतर,
दीमक सी खा रहे है।
लालची हो गया है इंसान,
ज्यादा की चाह में।
लाखो घर दुकान देखो,
बना लिये हैं राह में।
चलने को भी जगह,
कहाँ शेष बचीं है आज?
कल-कारखाने रोज बने,
बन रहे है होटल लाज।
जमीन के अंदर घर,
जमीन के ऊपर घर।
राह में गाड़ी गुजरती,
देखो आज छूकर घर।
खेतो की गत बिगड़ रहे है।
आबादी तेजी से बढ़ रहे है।
लूटकर धरती की अस्मत,
चाँद-तारो में चढ़ रहे है।
किस किस में करेगा कब्जा,
जाने उसकी नियत कैसी?
शैतान बन बैठा इंसान,
कर रहे है जग की ऐसी-तैसी।
चलते बुल्डोजर आय दिन,
अतिक्रमण तोड़ने को।
तब भी इंसान लगा हुआ है,
इंच - इंच जोड़ने को।
देखो पर निकल आये है,
दिवार दिन ब दिन बढ़ रहे है।
दिवारो की आड़ में इंसान,
बेधड़क अतिक्रमण कर रहे है।
निकल घर से,
भ्रमण में।
देख गाँव - शहर,
लिप्त है अतिक्रमण में।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बालको(कोरबा)
9981441795

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