शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

साहित्यश्री-2//7//*कन्हैया साहू "अमित"*

गाँव,गली और नगर, शहर,
अतिक्रमण का बढता कहर ।
चौंक चौपाल गलियाँ ये संकरे,
निजस्वार्थ में हुए अंधें बहरें।
उद्यान,मैदान ये स्कुल,गौठान,
ना छोङा चारागाह ना श्मशान।
धरती को मानें स्वयं की पूंजी,
अतिक्रमण इन्हें विकल्प सूझी।
जमीन सरकारी हो या आबादी,
हो गई उसी की जो झंङा गङा दी।
"पावर", पैसा, पहुँच, पकङ से,
मनमर्जी जो जमीन जकङ लें।
कौन बोलेगा,कौन अब सुनेगा,
सत्ता के आगे सभी यहाँ झुकेगा।
जमीन मिट्टी नहीं खरा सोना है,
मौका हाथों से स्वर्णिम क्यों खोना है?
बिजली,पानी झटपट पा जाऐं,
बेजा कब्जा जो ज्यादा जोर जमाऐं।
मौन है सत्ता,सरकारें छलती,
अतिक्रमण हटाओ ही कहती।
दृढ ईच्छा शासन नहीं दिखाती,
निरिह गरीब को ही ये सताती ।
शासक ही ये कुटील फरेबी है,
अतिक्रमण इनकी धनदेवी है।
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*कन्हैया साहू "अमित"*
*शिक्षक* हथनीपारा~भाटापारा
जिला~बलौदाबाजार (छ.ग.)
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