विषय अतिक्रमण (बेजकब्ज़ा)
आज प्रकृति के हर तत्वों पर मानव अतिक्रमण कर रहा है जिससे कई तरह की विपदायें धरती झेल रही है ,इन्ही भावो को इंगित करता मेरा ये गीत |
आज प्रकृति के हर तत्वों पर मानव अतिक्रमण कर रहा है जिससे कई तरह की विपदायें धरती झेल रही है ,इन्ही भावो को इंगित करता मेरा ये गीत |
अतिक्रमण
थक गए अहिराज अब तो त्रस्त महि के भार से
हेतु क्या है युग समर की
नीति को समझें जरा,
मूक क्रंदन से निकलती
आह को सुन लें ज़रा ,
नीति को समझें जरा,
मूक क्रंदन से निकलती
आह को सुन लें ज़रा ,
ज़लज़ला हँसता सृजन के दीनता व्यवहार से
थक गए अहिराज अब तो त्रस्त महि के भार से|
थक गए अहिराज अब तो त्रस्त महि के भार से|
कण्ठ सूखे निर्झरी के
मेरु खंडित हो रहे,
पाखियों के नीड़ उजड़े
विपिन के दुख क्या कहे,
मेरु खंडित हो रहे,
पाखियों के नीड़ उजड़े
विपिन के दुख क्या कहे,
मूल सारे गुम हुए अब मानवी अतिचार से
थक गए अहिराज अब तो त्रस्त महि के भार से |
थक गए अहिराज अब तो त्रस्त महि के भार से |
अनगिनत हैं जख्म भू पर
वैद्य शल्य न कर सके ,
हम लगाएं वृक्ष मरहम
घाव को कुछ भर सकें ,
वैद्य शल्य न कर सके ,
हम लगाएं वृक्ष मरहम
घाव को कुछ भर सकें ,
शेष रब सर्जन करेंगे युग कल्प उपचार से
थक गए अहिराज अब तो त्रस्त महि के भार से |
थक गए अहिराज अब तो त्रस्त महि के भार से |
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आशा देशमुख
एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा
एनटीपीसी जमनीपाली कोरबा
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