शनिवार, 17 सितंबर 2016

साहित्यश्री-1//12//जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"

प्रथम पूज्य गणेश जी
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हे ! प्रथम पूज्य गणेश जी।
जग की हालत देख जी।
अपने दुख दूर करने को,
दे रहे है औरो को क्लेश जी।
मातृ वचन निभाने को,
शीश अपने कटा दिये।
माँ - बाप चारो धाम है,
लगा परिक्रमा बता दिये।
पर ये मनचले
मन के मारे मानव,
माता - पिता को ही ,
घर से भगा दिये।
कोई कहाँ पढ़ता है?
लिखे सत लेख जी।
हे!प्रथम पूज्य गणेश जी...।
सही राह में कोई,
चल कहाँ रहे है?
उपकार करने घर से
कोई निकल कहाँ रहे है?
धन वैभव की लालच में,
लोग लगे हुए है,
सत की दीपक आखिर,
जल कहाँ रहे है?
फांस रहे है एक दूसरे को,
स्वार्थ की जाल फेक जी।
हे!प्रथम पूज्य गणेश जी....।
गली गली सब रखे आपको,
पर दिल में कोई न रख पाया।
दानवो का गुणगान करे जन,
बस भल मानुष से सक पाया।
हे!ज्ञान बुद्धि के दाता गणेश,
जग के तुम रखवार।
पीकर मोह माया का पेय जन,
भक्ति रस न चख पाया।
फंसकर मैं की जाल में,
बाँट रहे है ईर्षा द्वेष जी।
हे!प्रथम पूज्य गणेश जी........।

जीतेन्द्र वर्मा"खैरझिटिया"
बालको(कोरबा)
9981441795

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