अतिक्रमण (बेजा कब्जा)
ये उस दिन की बात है,जब हम छोटे छोटे थे।
गाँव गली भाठा टिकरा,बहुत बड़े और मोटे थे।।
गाँव गली भाठा टिकरा,बहुत बड़े और मोटे थे।।
घुमा फिरा खेला हमने,लम्बी दौड़ लगाई है।
बेजा कब्जा का ये राक्षस,जाने कहाँ से आई है।।
बेजा कब्जा का ये राक्षस,जाने कहाँ से आई है।।
पहले घर-घर गायें होतीं,अब तो सारे बेच रहे।
चारा गाह तो खत्म हो गया,अतिक्रमण में देख रहे।।
चारा गाह तो खत्म हो गया,अतिक्रमण में देख रहे।।
बच्चे अब घर में रहते हैं,बड़े न बाहर जाते हैं।
कभी जो बाहर चले गए तो,उसी पाँव घर आते हैं।।
कभी जो बाहर चले गए तो,उसी पाँव घर आते हैं।।
भाठा अब तो कहीं न दिखता,भर्री कहीं न दिखता है।
गली-गली अब सकरी हो गई,ताल तलैया बिकता है।।
गली-गली अब सकरी हो गई,ताल तलैया बिकता है।।
शासन सबको पट्टे देती,सुविधा भी भरपूर है।
कुर्सी का सब खेल है साथी,जनता भी मजबूर है।।
कुर्सी का सब खेल है साथी,जनता भी मजबूर है।।
क्या गाँव क्या शहर कहोगे,क्या राज्य क्या देश।
अतिक्रमण की भेट चढ़ गई,बदल गया परिवेश।।
अतिक्रमण की भेट चढ़ गई,बदल गया परिवेश।।
अब ओ दिन भी आये गा,जब नजर बन्द हो जाएंगे।
मोबाईल में मिला करेंगे,घर में जीवन बिताएंगे।।
मोबाईल में मिला करेंगे,घर में जीवन बिताएंगे।।
न सुधरा है न सुधरे गा,अपना भारत देश।
पग रखने को जमी न होगी,शायद यही सन्देश।।
पग रखने को जमी न होगी,शायद यही सन्देश।।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाज़ार
बलौदा बाज़ार
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