सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

साहित्यश्री-4//6// गोपाल चन्द्र मुखर्जी

" एक कदम उजाले की ओर "
जागरे, मन जागरे,
नई सुबह की ओर कदम राख रे!
पराधीनता के अक्टपाश से
मुक्त होने उठ रे।
गर्जन देशप्रेमी सेनानी का
कदम कदम बाढाते जा,
न​ई संकल्प लेते जा
बेटी नारी बचाते जा। 
मनाते हो परव दीपान्विता
नवरात्री, जागराता! 
लक्ष्मी दुर्गा पूजते हो 
कन्याभ्रूण भी हत्या करते हो! 
महामाया रूठेगी 
बंशबृद्धि रुखेगी। 
अंगन में दीपक बुझेगा 
अन्धेरा छा जाएगा!
मन, एक कदम आगे आ जा
बन्ध कर नारी निर्यातन प्रतारना। 
दीप लक्ष्मी जगमगेगी
संसार उजला की ओर बढेगी॥ 
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( गोपाल चन्द्र मुखर्जी )

साहित्यश्री-4//5//शुभम वैष्णव

क्योकि नहीं है जीवन में सिर्फ अँधेरा,
एक कदम और उजाले की ओर बढ़ा।
माना दुनिया में बहुत है तेरे दुश्मन।
लेकिन कुछ करने का आज बना ले मन।
मिलता किसे नहीं दुनिया में दर्द भला,
एक कदम और उजाले की ओर बढ़ा।
औरों की भलाई लोग अगर करते हैं।
वो अमर होते है जब कभी भी मरते हैं।
अपना हाँथ बढ़ाने से न ऐसे घबरा,
एक कदम और उजाले की ओर बढ़ा।
तेरे साथ खड़ा ये सारा जमाना है।
तुमको स्वर्ग धरा को फिर से बनाना है
जितनी है हिम्मत तुझमे वो आज लगा,
एक कदम और उजाले की ओर बढ़ा।
अभिमन्यु की वीरता तू करके याद निकल।
तेरा क्या है ये समझने के बाद निकल।
तेरे खातिर सभी करेंगे आज दुआ,
एक कदम और उजाले की ओर बढ़ा।
-शुभम वैष्णव

साहित्यश्री-4//4//आचार्य तोषण

"एक कदम उजाले की ओर..."
उडते चले उन्मुक्त गगन में ,चीर बादल काले की छोर
संग बढाएँ दृढ़संकल्पों से ,एक कदम उजाले की ओर
मंजिल देखती राह हमारी ,कब तुम कदम बढाओगे
रहना है खरहा बनकर या, कच्छप की दौड़ लगाओगे
त्याग निद्रा आलस की ,जगा रही दिनकर की भोर
उडते चले उन्मुक्त गगन में ,चीर बादल काले की छोर
संग बढाएँ दृढ़संकल्पों से ,एक कदम उजाले की ओर
हार न माने चींटी कभी जब, अपनी कदम बढाती है
कदम बढाए कर्मपथ पर ,नीत मंजिल को पा जाती है
उत्साह जगाकर राह बनाए, बांधे मन साहस की डोर
उडते चले उन्मुक्त गगन में ,चीर बादल काले की छोर
संग बढाएँ दृढ़संकल्पों से ,एक कदम उजाले की ओर
दीपों की है अवली सजी ,द्वार द्वार हो रहे मंगलाचार
नवप्रकाश है नवप्रभात है ,यह दीपावली का त्यौहार
समता ममता भाव एक हो, आओ मनाएं सब पुर जोर
उडते चले उन्मुक्त गगन में ,चीर बादल काले की छोर
संग बढाएँ दृढ़संकल्पों से ,एक कदम उजाले की ओर
©®
आचार्य तोषण ,धनगांव डौंडीलोहारा,बालोद
छ. ग.४९१७७१

साहित्यश्री-4//3//दिलीप कुमार वर्मा

""एक कदम उजाले की ओर""
चलो घर-घर दीप जलाएं,
कोने-कोने को चमकाएं। 
प्रेम भरा अमृत बरसा कर
घर आँगन सब का महकाएं।
रहे न कोई कमजोर
एक कदम उजाले की ओर। ।1।
चलो सदा नेकी कर जाएं
भटके को हम राह दिखाएँ ।
मानवता का बन मिशाल हम
हाँथ पकड़ मंजिल पहुंचाए।
भाई चारे का दौर
एक कदम उजाले की ओर। ।2।
झोपड़ पट्टी कहीं दिखे न
दुखिया हमसे कहीं छिपे न
हर पंगु का पैर बने हम
पग हमारा कहीं रुके न।
तिमिर न हो घनघोर
एक कदम उजाले की ओर। ।3।
चारो तरफ खुशियाँ बगराएं
बच्चों में हम प्यार लुटाएं
अपनों का एहसास दिलाकर
दया मया सब में बरसाएं।
खुशियों का हो शोर
एक कदम उजाले की ओर। ।4।
हर एक घर में चंदा चमके
घर-घर में अब सूरज दमके
बिछे चाँदनी आँगन-आँगन
सुबह शाम घर खुशियाँ खनके
सुंदर सा हो भोर
एक कदम उजाले की ओर। ।5।
कहीं न कोई भिखारी होगा
चलने को न कटारी होगा
हर कोई अब सांथ रहेंगे ।
कहीं न अब अंधियारी होगा
गूंजे नभ में शोर
एक कदम उजाले की ओर। ।6।
जहां कोई न भूखा होगा
देश कभी न सुखा होगा
मेहनत की जो राह पकड़ लें
बात कभी न झूठा होगा।
उजियारा हो अंतिम छोर
एक कदम उजाले की ओर। ।7।
चलो स्वच्छता अलख जगाएं
जन-जन को हम कह समझाएं
शौचालय की राह पकड़ कर
सुंदर भारत देश बनाएं।
रखें स्वच्छ सब ओर
एक कदम उजाले की ओर। ।8।
दिलीप कहे ये बात पुरानी
घटी है घटना, नहीं कहानी
एक अकेला तोड़ पहाड़ी
करी सुगम ओ राह दुखानी ।
साहस था पुर जोर
एक कदम उजाले की ओर। ।9।
दिलीप कुमार वर्मा
बलौदा बाजार
9926170342

साहित्यश्री-4//2//चोवा राम वर्मा "बादल "

उजाले की ओर --(आह्वान)
सत्पथ के लिए होकर विकल
तोड़ कारा तम का,बाहर निकल ।
मचल मचल कर अचल ध्येय 
क्यों होगा विष तेरा पाथेय ।
दिखा पूर्ण दमखम
बढ़ा एक कदम
उजाले की ओर। 1।
दिनकर चन्द्र सितारे
जुगनू भी नही हारे ।
देता संदेश यही दीपक
परोपकार करो भरसक ।
त्याग अहम, बोलो हम
बढ़ा एक कदम
उजाले की ओर ।2 ।
चिंगारी भर चिंतन में ,
देश प्रेम अंकित कर मन में ।
भेदभाव के तक्षक का,
भाईचारे के भक्षक का ।
फण कुचल निकालो दम
बढ़ा एक कदम
उजाले की ओर । 3 ।
ना दीन बनें ना हिन बनें ,
स्वाभिमान का शौकीन बनें ।
वन्दनीय फक्कड़ फकीर ,
रहीम सूर तुलसी कबीर ।
क्षत्रपति से हैं क्या कम ?
बढ़ा एक कदम
उजाले की ओर । 4 ।
श्रम सीकर से शोभित भाल ,
ऋजुपथ गामी सिंहवत चाल ।
मृदु मुस्कान-फुलझड़ी झरे ,
जगमग दीवाली उमंग भरे ।
होगा सत्यम शिवम् सुंदरम
बढ़ा एक कदम
उजाले। की ओर ।
रचनाकार---चोवा राम वर्मा "बादल "
हथबंद

साहित्यश्री-4//1//राजेश कुमार निषाद

।। एक कदम उजाले की ओर ।।
जितनी भीड़ बड़ रही है जमाने में
लोग उतने ही अकेले होते जा रहे है।
इस दुनिया के लोगो को कौन समझायें
सारे खिलौना छोड़कर जज्बातों से खेले जा रहे है।
इन सबसे तुम दूर रहो ना देखो मुड़कर पीछे की ओर
निरंतर बढ़ाते जा अपना एक कदम उजाले की ओर।
तुम स्वर्ग का सपना छोड़ दो
नर्क से अपना नाता तोड़ दो।
पाप पुण्य का लेखा जोखा तो ईश्वर का है
अपने सारे कर्म कुदरत पर छोड़ दो।
मन में ना रखो कोई भावना जो कर दे आपको कमजोर
निरंतर बढ़ाते जा अपना एक कदम उजाले की ओर।
राहों में कितने भी मुश्किल हो
पर तुम निकल जाओगे।
कितने भी ठोकर खा लो चाहे
पर तुम सम्भल जाओगे।
ये अँधेरा है जो जुगनू से भी घबराता है
सदा तुम प्रकाशवान बनो न देखो सूरज की ओर
निरंतर बढ़ाते जा अपना एक कदम उजाले की ओर।
उम्र भर तुम्हे कोई साथ नही देगा
अकेला तुम्हे रहना है।
पथ में तुम्हारे कितने भी मुश्किलें आये
कठोर बन कर तुम्हे सहना है।
चिंताओं को दूर कर छोड़ दो उसे पीछे की ओर
निरंतर बढ़ाते जा अपना एक कदम उजाले की ओर।
रचनाकार ÷ राजेश कुमार निषाद
ग्राम चपरीद ( समोदा )
9713872983

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

//साहित्य श्री-3 का परिणाम//

‘साहित्य श्री-3‘ ‘जय माता दी‘ विषय पर आयोजित किया गया जिसमें 10 रचनाकार मित्र हिस्सा लिये । सभी रचनाकारों का प्रयास सराहनीय रहा । इस आयोजन के सभी प्रतिभागियों का हार्दिक आभार । प्राप्त रचनाओं में भाव, शिल्प और दिये गये विषय के साथ न्याय संगतता के आधार पर ‘श्रीमती आशा देशमुख‘ को ‘साहित्य श्री ‘ से सम्मानित किया जा रहा है ।


आदरणीया श्रीमती आशा देशमुख को छत्तीसगढ़ साहित्य दर्पण एवं छत्तीसगढ़ी साहित्य मंच की ओर से कोटिश बधाई ।